Sunday, March 30, 2008

चलो एक बार फ़िर से

चलो एक बार फ़िर से, अजनबी बन जाए हम दोनों

ना मैं तुम से कोई उम्मीद राखु दिलानावाजी की
न तुम मेरी तरफ़ देखो, ग़लत अंदाज नजरों से
न मेरे दिल की धड़कन लादाखादाये मेरी बातों से
ना जाहीर हो तुम्हारी कशमकश का राज नजराने


तुम्हें भी कोई उलज़ं रोकती हैं पेशाकदामी से

मुजे भी लोग कहते हैं की ये जलवे पराये है
मेरे हमराह भी रुसवाईयाँ हैं मेरे माजी की
तुम्हारे साथ अभी गुज़री हुयी रातों के साए है



तार्रुफ़ रोग हो जाए, टू उसको भूलना अच्छा

ताल्लुक बोज़ बन जाए टू उसे तोड़ना अच्छा
वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना ना, न हो मुमकीन
उसे एक खूबसूरत मोड़ दे कर भूलना अच्छा


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